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Monday, June 29, 2020

About An Infection


Infection

Basics of Infection

Infection….. 
Today’s most usable word is Infection.
We see… we read… we hear, everywhere Infection… Infection… and Infection…
Bacterial infection, Viral Infection etc…
Today we talk about this, and some other word parameter which is related with infection.

So,

 Everyone want to know,
What is Infection…..????????
And the answer is,

v Infection -: Infection is a state when microorganism succeed in entering a host and reproduce more of their kind.

v Contamination-: The presence of an infective agent on a body surface or in an inanimate object or substance is termed Contamination.
So this microorganism entering in the host they want agent.

v Pathogens -: Agent of the infection called Pathogens.

v Reservoirs-: Pathogens (agent of infection) must find a place to live and multiply, such places are called Reservoirs.

Till that we talk about the basic knowledge of infection and their parameter or related word.

Now we talk about the how this microorganisms is spread.
So we see now mode of transmission of infection. Mode of
Transmission means how to spread or way of spread.
                                                               
Mode of transmission of infection



 




Direct Transmission

Indirect Transmission
1)  Direct contact
2)  Droplet Infection
3)  Contact with soil
4)  Inoculation into skin or
The mucous membrane.
5)  Trans placental transmission

1)  Vehicle borne
2)  Vector borne
3)  Air borne
4)  Formite borne
5)  Unclear hands and fingers
 Direct transmission means agent of infection directly come or spread with infected person to other person.
Here we talk about the direct transmission mode of infection:

1)  Direct contact à if the infected person come in direct contact with other person like shake hand etc.

2)  Droplet infection à when infected person sneezing of coughing at that time lots of droplets come out from his/her body in that droplets lots of viruses or bacterias are available which is infected to others.

3)  Contact with soil à in the soil, lots of microorganism are available which is reason for spread the infection.

Indirect mode of Transmission means agent of infection indirectly come or spread with infected person to other person like,  infected person touch anything so on that thing microorganism (virus/ bacteria) are spread and when any other one touch the same things the agent of infection spread on that one, so this is known as indirect transmission.
So the indirect transmission is spread with vehicle, vector, air, formite or unclear hands.


·       So now how can we do to prevent and control the spreading of an infection or disease?

è      The infection agent at it source either destroying it at this very point or containing it till it dies itself due to lack of a new host.

è      Not allowing the infection or the disease to spread to a new host transmission.

è      Protecting the host by making him or her strong enough to resist the infection or disease.


è      In short, Go Green, Prefer Neat & Hygiene Environment, Eating Healthy Food and most important maintaining the routine with yoga and exercises.


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Sunday, June 21, 2020

Father- The Dashing Personality -who is the main Pillar of the Family. / पिताजी - मार्गदर्शक , योगी एवं परिवार का प्रेरणा स्रोत

Father- The Dashing Personality -who is the main Pillar of the Family



पिताजी - मार्गदर्शक , योगी एवं परिवार का प्रेरणा स्रोत 

 

🙏🙏🙏  पिताजी / बाबूजी को सादर प्रणाम।🙏🙏🙏

सही कहा गया है  ,
  
F = Forever & Friendly,

A = Achiever & Able to Act Wisely,

T = Trustworthy & Thought Teacher,

H = Heroic & Helping Hope ,

E = Exceptional Expert & Equal Emotioner,

R = Really Great Person & Responsible Rainbow.



पिता , फादर  एक प्रेरणा स्रोत , ऊर्जास्रोत हैं ,जो संतानो , परिवार एवं सभी के जीवन में अनन्य ईश्वर रूपी प्रतापी व्यक्तित्व होते हैं। इसलिए संस्कृत में कहा गया है की मातृदेवो भवः।  पितृदेवो भवः।  गुरुदेवो भवः। पिता अपनें संतानो ,परिवार की मातृतुल्य भावना के साथ देखभाल करते हैं , गुरु की तरह मार्गदर्शन करते हैं एवं संतानो में , परिवारजनों में उच्च आदर्श जीवन मूल्यों का सिंचन भी करतें हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी यह व्यक्ति विनम्र ,शांत एवं कर्तव्य पथ पर बड़ी ही परिपक़्वता के साथ जनकल्याण ,परिवारकल्याण के सतकर्मों में अग्रशील रहते हैं। 
So,it's truly said that,

Look Back & Get Experience,
Look Forward & See Hope,
Look Around & Find Reality,
Look Within & Find Yourself.

पिता सिर्फ संतानो का जन्मदाता ही नहीं अपितु एक आज्ञाकारी पुत्र , अच्छा पति ,एवं शिष्टाचारी व्यक्ति होते हैं ,इसलिए इन्हें बहुमुखी प्रतिभा के धनी भी कहा जाता है। पिता परिवारजनो , संतानो के मध्य पोषण एवं सामाजिक -आर्थिक संबंधों का अदभुत संतुलन बनायें रखते हैं। वे सहज व्यक्तित्व प्रतिभा द्वारा  उदार भावना से सब का संपोषण कर ,उच्च आदर्श जीवन यापन दिशा में ,समाजकल्याण के लिए प्रेरित करतें हैं। परिवार में अपने साहस ,ज्ञान द्वारा समव्यवहार करके परिवार की व समाज की उन्नति में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देतें हैं। पिता, फादर  -अनुशासन प्रिय ,कठोरता के प्रतिक , का वास्तव हृदय कोमल , निर्मल होता है ,जो प्रतिक्षण स्वजनों के लिये धडकता है। 

सही कहा गया है  , Today means----
T = This is an,
O = Opportunity to,
D = Do,
A = a work, better than,
Y = Yesterday. 

पिता स्थिरता के साथ परिवर्तन के कर्ता व आमूल समर्थक होते हैं। संयमी , सशक्त , सादगीपूर्ण जीवन निर्वाह कर ,किसी भी तरह के अपेक्षाओं से परे ,अपने कर्त्तव्य पथ पर हमेंशा डटे रहते है।  सत्कर्मों के माध्यम से परिपक्वता व उन्नति के सीमाचिन्ह रूप यह व्यक्ति संतानो को अपनें कंधों पर बैठा ,सैर करा , उच्च आदर्शों के दर्शन करवाते हैं। Dedication ,Devotion and Determination - के गुणों से भरपूर हमारें पिता एक HERO हीं तो है। वर्क -प्रोफेशन में देर तक काम करके ,घर लौट कर ,परिवार में भी क्वॉलिटी समय देते हैं। संतानो के सर्वांगी विकास में पिता का योगदान अमूल्य है। प्रोफेसनल व पर्सनल लाइफ को बैलेंस कर परिवार व जनकल्याण के लिये पिता हंमेशा यत्नशील रहतें हैं। ऐसे इंटेलिजेंट , पंचुअल पिता का संतान होना गौरव की बात है। 

पिताजी  की सिर्फ यही उम्मीद होती है की - उनकें संतान ,स्वजन अपने कर्तव्य पथ पर हरंहमेश अग्रेसर रहकर ,वसुधैव कुटुंबकं की भावना को चरितार्थ कर ,स्थितप्रज्ञ बनकर ,विनम्रता के साथ कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़े। 

पिता -  एक उमदा व्यक्तित्व का अंश होने का गर्व है हमें। एक ऐसे सत्कर्मी , महाबाहो ,व्यक्ति को हृदय पूर्वक ,चरणों में शीश झुकाकर नमन।  

 🙏🙏🙏

भवदीय 


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Friday, June 5, 2020

पर्यावरण - जैवभौतिक संकल्पना या सजीव के जीवन का मूलाधार :: पर्यावरण संरक्षण / Environment - BioPhysical Concept or Base of Living Life :: Environment protection


जीवन उदभव ,अस्तित्व व विकास का एक सुरक्षित आवरण - पर्यावरण ::  संरक्षण की आवश्यकता है जिसकी  (!!!)


A safe layer of the origin of life, existence and development - 

Environment  ::  need protection (!!!)




 5th June- World Environment Day -is celebrated to encourage awareness and action for the protection of the Environment as well as  Earth.

" भर गया है जहर से, संसार जैसे हार खाकर, 
देखते हैं लोग लोगों का, सही परिचय न पाकर ,
  बुझ गई है लौ "पृथा " की , जल उठो फिर सींचने को। "

श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी " निराला" द्वारा रचित पंक्तियाँ उचित है। सामान्य भावार्थ है - "निराशा में आशा का संचार करना " . . .  


पर्यावरण = Environment= शब्द फ्रेंच शब्द  " environner" से लिया गया है।  जिसका अर्थ होता है "घिरा हुआ (to surround)". सामान्यतः पर्यावरण की "प्रकृति ( nature)" से समता की जाती है,जिसके अंतर्गत पृथ्वी के भौतिक घटकों को सम्मिलित किया जाता है की जो जीवों के उत्पन्न , विकास व संवर्द्धन हेतु आवश्यक परिस्थितियाँ प्रदान / प्रस्तुत करते हैं। 

पर्यावरण एक जैविक व भौतिक संकल्पना है। अतः इसमें पर्यावरण को  जैविक व अजैविक संघटकों  के आधार पर वर्गीकरण किया गया है - १) अजैविक पर्यावरण - भूमण्डलीय , जलीय ,वायुमण्डलीय , तथा -  २ ) जैविक पर्यावरण - वानस्पतिक पर्यावरण , जंतु पर्यावरण। मनुष्य ने जैविक संघटक में -सामाजिक, आर्थिक,धार्मिक आदि,घटकों को जोड़कर नया मानवनिर्मित पर्यावरण - " सांस्कृतिक पर्यावरण " की रचना की है। सभी जीवधारियों का जीवन अस्तित्व पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर ही आधारित है। संसाधनों का आधारभूत नियम है-"समस्त संसाधन निश्चित व सिमित होते है। "प्राकृतिक संसाधनों हैं- भूमि , मृदा ,जल ,खनिज , पौधें ,जीव -जंतु आदि।  मनावसमाज के उद्धभव ,अस्तित्व एवं विकास के मूलाधार है ये- पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधन।  


 प्राचीन काल से ही मानव पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहा है ,प्रकृति जागरूक रहा है। प्राचीन ग्रंथो में , श्री वाल्मीकि रचित 'रामायण' में , महाकवि कालिदास की रचनाओं में, आदि में प्रकृति सौंदर्य का वर्णन अदभुत , अनन्य है। पुरे ब्रह्माण्ड में विकसित - पृथ्वी पर जीवन है ,पर  यह हरा-भरा ग्रह क्रमशः प्रदूषित हो रहा है। मशीनीकरण व मानवीय कार्यकलाप से पर्यावरण संबंधी अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती है / हुई हैं। ,जैसे की -  मृदा का ह्रास , वायु की गुणवत्ता में कमी आना , जल प्रदूषण , जैव विविधता संकट आदि। पुराण में कहा गया है की ,

" पारुष्यं सर्वभूतानां प्रथमं नरकं स्मृतं। 
       छेदनं वृक्षं जातिनाम  द्वितीयं नरकं स्मृतं।। "

 सामान्य अर्थविस्तार है - जीवमात्र की हिंसा को पहले नरक का नाम दिया और वनस्पतियों के छेदन को दूसरे। "

अतः वर्तमान व भावी पीढ़ियों के अस्तित्व को बनायें रखने के लिए पर्यावरणीय संतुलन आवश्यक है। पर्यावरण प्रबंधन व प्रकृति संरक्षण प्रवृति से ही मानव समाज का अस्तित्व व विकास दीर्घावधि तक बना रह सकता है। 

विश्व पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत १९४८ में " द इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर एंड नेचुरल   रिसोर्सेज " की स्थापना द्वारा की गई थी। दुनिया के कई देश अपने प्रयासों द्वारा पर्यावरण संरक्षण के प्रयास कर रहे हैं । १९७२ में हुए स्टॉकहोम पर्यावरण संमेलन में ५ जून ( 5th June) को विश्व पर्यावरण दिवस घोषित किया गया और सभी सम्मिलित देशों ने पर्यावरण  व पर्यावरण संरक्षण के प्रति सक्रीय एवं संकलती प्रयास को महत्त्व दिया। इसकेबाद रियो-डी संमेलन , वियेना कन्वेंशन ,कोपेनहेगन संमेलन आदि संमेलनो द्वारा विश्व पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सराहनीय आमूल कदम व वैज्ञानिक प्रयास किये गए हैं ,जैसे की - सतत विकास की संकल्पना,ग्रीनहाउस गैसेस के उत्सर्जन पर नियंत्रण , वृक्षारोपण के व्यापक प्रयास ,संसाधनों का अनुकूलतम उपभोग, रिन्यूएबल एनर्जी सोर्सेज -सोलर एनर्जी , विंड एनर्जी का सहज उपयोग ,... आदि।  

आजकल तो "ग्रीन ग्रोथ ", " गो - ग्रीन" को महत्त्व दिया जा रहा है, जिसकी  सामान्य व्याख्या है-"आर्थिकविकास की वह प्रणाली जिसके माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का चिरस्थायी रूप में उपयोग किया जाता हो।अतः हम - वृक्षारोपण द्वारा , जल का सही उपयोग कर , कूड़ेदान के उपयोग द्वारा इत्यादि - यथाशक्ति प्रयासों द्वारा पर्यावरण शुद्ध रख सकते हैं।
श्री मन्नारायण जी ने यथार्थ अंकित किया है ,

"फूल न तोड़ो , ए माली  तुम ,
भले ,डाल  पर मुरझाएँ ;
बना नहीं सकते जिनको हम ,
तोड़ उन्हें क्यों मुस्काएँ। । "

आधुनिक प्रौद्योगिकी के इस दौर में , गलाकाट  प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में पर्यावरण में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है , प्रकृति में काफी क्षति हुई है। अतः आधुनिक तकनिकी के  समन्वय व योग्य प्रयोग के माध्यम से , पर्यावरण से  घनिष्ठता स्थापित करना हमारा परम कर्तव्य बन गया है।

तभी धरती " शस्य श्यामला " बनी रहेगी व वसुंधरा की हरितिमा   पुनः लौटेगी। विश्वबंधुत्व भावना एवं सकल प्रयासों मात्र से ही हमारी पृथ्वी दीर्घकाल तक जीवों के रहने योग्य बनी रहेगी। अतः यथाचित कहा गया है की ,

" रक्षये प्रकृति पान्तुलोका। "

(सामान्यार्थ है -ओ विश्व के लोगों ! प्रकृति का संरक्षण करते हुए इसका उपयोग करो। ) 

 भवदीय 


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Sunday, May 31, 2020

Time is the Infinite, to keep continue progress of existence and also progressive events... / समय अनंत है, अस्तित्व की प्रगति ,साथ ही सतकर्म के माध्यम से ...

एक क्षण समय का _ Just a moment of The Time


 एक प्रचलित कथन है - " मैं समय हूँ। "

And also truly said that,

" The great end of Life is not knowledge but action - at appropriate time."



समय -  एक नियत गति से हंमेशा आगे बढ़ता रहता है , चलता रहता है। यह एक निर्विरोध , निरंतर , निर्बाध है , न किसीकी प्रतीक्षा करता है न ही आराम करता है। समय के प्रत्येक पल के सदुपयोग द्वारा ही हम जीवन के हरक्षण को अविस्मरणीय , आनंददायक बना सकते है। इसलिए कहा गया है की ,
  
" कल करें सो आज कर , आज करें सो अब ,
 पल में परिलय होएगी , बहुरि करेगो कब।  "

प्रत्येक क्षण का यथोचित सम्मान कर , निहित कर्म द्वारा ही मनुष्य जीवन को सार्थक कर सकते है।  जैसे की , शिक्षा प्राप्ति समय योग्य शिक्षा प्राप्त करना, गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों का निर्वहन , बालक से बड़े हो जाने पर हमें हमारा बचपन याद आना,  नौकरी करते हुये कॉलेज के दिन याद आना,  छोटे हमारे बच्चो को डांटते समय पेरेंटस की डांट याद आ कर मुस्कुराना, हरकुछ दिन पे हमारे पेरेंटस का हमारे लिए सरप्राइस लाते हुए का याद आना , स्कूल में उच्च अंक पाना , नौकरी मिलने का वह दिन , जरुरत मंदो की मदद कर उनकी  आँखों में दिखता प्यार आदि  ....... 
सदगुणी , कर्मठ व्यक्ति अपनें प्रत्येक पल के महत्व को समज , उन क्षणों का यथोचित सन्मान कर , अपनें व स्वजनों के जीवन समय को अमृततुल्य बना देता है। अतः संस्कृत में योग्य कहा है की ,

 "काव्यशास्त्र विनोदेन , कालो गच्छति धीमतां |
 व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा || "

(सामान्य अर्थविस्तार है की " बुद्धिशाली लोको का समय काव्य ,शास्त्र ,  विनोद में, सत्कर्मो में, है।  मूर्खो का समय व्यसन ,निंद्रा व कलह में बीतता है। )

मनुष्य जीवन में सुब कुछ प्राप्त कर सकता है - उचित समय पर यथा शक्ति कर्म के माध्यम से। क्यों की जीवन में एकबार समय व प्राण चले जाते है तो वापस कभी नहीं आतें। 



 गुजराती में कहा गया है - 

"સંપત ગઈ તે સાંપડે , ગયાં વળે છે વહાણ ;
ગત અવસર આવેં નહિ , ગયા ન આવે પ્રાણ  ."

(सामान्य अर्थविस्तार है की - जो संपत्ति चली गई है वह भी वापस पाई  है , जो नौकाए व्यापर के लिए गए है  वापस आ सकते है , परन्तु  बीत गया अवसर व शरीर  निकले प्राण कभी वापस नहीं आतें। )

अतः समय के सदुपयोग के लिए अपने दैनिक क्रम को सुनिश्चित कर, एकाग्र चित्त हो कर कार्य करने से अवश्य ही उस समय - क्षण की अनुभूतिमें  अलौकिकता का एहसास होने के साथ सफलता भी जरूर प्राप्त होगी।  श्री तुलसीदासजी ने यथार्थ कहा है की ,

"समय जात  नहीं लागहि बारा। "

अतः शारीरिक ,मानसिक ,आध्यात्मिक व सर्वांगी विकास एवं देश -समाज कल्याण हेतु , प्रत्येक क्षण की अनुभूति कर , समय का सन्मान करें। 

भवदीय 

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